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वैराग्य शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 9
निवृता भोगेच्छा पुरुषबहुमानो विगलितः समानाः स्वेर्याताः सपदि सुहृदो जीवितसमाः । शनैर्यष्टयोत्थानम घनतिमिररुद्धे च नयने अहो धृष्टः कायस्तदपि मरणापायचकितः ।।
बुढ़ापे के मारे भोगने की इच्छा नहीं रही; मान भी घट गया; हमारी बराबर वाले चल बसे; जो घनिष्ट मित्र रह गए हैं, वे भी निकम्मे या हम जैसे हो गए हैं। अब हम बिना लकड़ी के उठ भी नहीं सकते और आँखों में अँधेरी छा गयी है। इतना सब होने पर भी, हमारी काया कैसी बेहया है, जो अपने मरने की बात सुनकर चौंक उठती है?
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