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वैराग्य शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 87
यावत्स्वस्थमिदं कलेवरगृहं यावच्च दूरे जरा यावच्चेन्द्रियशक्तिरप्रतिहता यावत्क्षयो नायुषः । आत्मश्रेयसि तावदेव विदुषा कार्यः प्रयत्नो महा- न्प्रोदीप्ते भवने च कूपखननं प्रत्युद्यमः कीदृशः ।।
जब तक शरीर ठीक हालत में है, बुढ़ापा दूर है, इन्द्रियों की शक्ति बनी हुई है, आयु के दिन बाकी हैं, तभी तक बुद्धिमान को अपने कल्याण की चेष्टा अच्छी तरह से कर लेनी चाहिए। घर जलने पर कुआँ खोदने से क्या फायदा।
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