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वैराग्य शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 86
मातर्मेदिनि तात मारुत सखे तेजः सुबन्धो जलं । भ्रातर्व्योम निबद्ध एव भवतामेष प्रणामाञ्जलिः ।। युष्मतसंगवशोपजातसुकृतोद्रेकस्फुरन्निर्म्मल- ज्ञानापास्तसमस्तमोहमहिमा लिये परे ब्रह्मणि ।।
हे माता पृथ्वी! पिता वायु! मित्र तेज! बन्धु जल! भाई आकाश! अब मैं आपको अन्तिम विदाई का प्रणाम करता हूँ। आपकी संगती से मैंने पुण्य कर्म किये और पुण्यों के फल स्वरुप मुझे आत्मज्ञान हुआ, जिसने मेरे संसारी मोह का नाश कर दिया। अब मैं परब्रह्म में लीन होता हूँ।
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