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वैराग्य शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 85
भिक्षाशी जनमध्यसंगरहितः स्वायत्तचेष्टः सदा दानादानविरक्तमार्गनिरतः कश्चित्तपस्वी स्थितः।। रथ्याक्षीणविशीर्णजीर्णवसनैः सम्प्राप्तकंथासखि- र्निमानो निरहंकृतिः शमसुखाभोगैकबद्धस्पृहः।।
ऐसा तपस्वी कोई विरला ही होता है, जो भीख मांगकर खाता है, जो अपने लोगों में रहकर भी उनमें मोह नहीं रखता, जो स्वाधीनतापूर्वक अपना जीवन निर्वाह करता है, जिसने लेने और देने का व्यवहार छोड़ दिया है, जो राह में पड़े हुए चीथड़ों की गुदड़ी ओढ़ता है, जिसे मान का ख्याल नहीं है, जिसमें अभिमान नहीं है और जो ब्रह्मज्ञान के सुख को ही सुख मानता है।
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