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वैराग्य शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 84
रम्याश्चन्द्रमरिचयस्तृणवती रम्या वनान्तस्थळी रम्यः साधुसमागमः शमसुखं काव्येषु रम्याः कथाः । कोपोपहितवाष्पबिन्दुतरलं रम्यं प्रियाया मुखं सर्वंरम्यमनित्यतामुपगते चित्तेनकिञ्चित्पुनः ।।
चन्द्रमा की किरणे, हरी-हरी घास के तख्ते, मित्रों का समागम, शृङ्गार रस की कवितायेँ, क्रोधाश्रुओं से चञ्चल प्यारी का मुख – पहले ये सब हमारे मन को मोहित करते थे; किन्तु जब से संसार की अनित्यता हमारी समझ में आयी, तब से ये सब हमें अच्छे नहीं लगते।
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