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वैराग्य शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 83
यदासीदज्ञानं स्मरितिमिरसंस्कारजनितं तदा दृष्टं नारिमयभिदमशेषं जगदपि ।। इदानीमस्माकं पटुतर विवेकाञ्जनजुषां समीभूता दृष्टीस्त्रिभुवनमपि ब्रह्म तनुते ।।
जब तक हमें कामदेव से पैदा हुआ अज्ञान-अन्धकार था, तब तक हमें सारा जगत स्त्रीरूप ही दीखता था। अब हमने विवेकरूपी अञ्जन आँज लिया है, इससे हमारी दृष्टी समान हो गयी है। अब हमें तीनो भुवन ब्रह्मरूप दिखाई देते हैं।
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