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वैराग्य शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 82
ब्रह्माण्डमण्डलीमात्रं किं लोभाय मनस्विनः । शफरीस्फुरितेनाब्धेः क्षुब्धता जातु जायते ।।
जो विचारवान है, जो ब्रह्मज्ञानी है, उसे संसार लुभा नहीं सकता। मछली के उछालने से समुद्र उड़ नहीं उमड़ता।
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