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वैराग्य शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 79
मही रम्या शय्या विपुलमुपधानं भुजलता वितानं चाकाशं व्यजनमनुकूलोऽयमनिलः।। स्फुरद्दीपश्चन्द्रो विरतिवनितासंगमुदितः सुखं शान्तः शेते मुनिरतनुभूतिर्नृप इव।।
मुनि लोग राजा महाराजाओं की तरह सुख से ज़मीन को ही अपनी सुखदायिनी शय्या मान कर सोते हैं। उनकी भुजा ही उनका गुदगुदा तकिया है, आकाश ही उनकी चादर है, अनुकूल वह ही उनका पंखा है, चन्द्रमा ही उनका चिराग है, विरक्ति ही उनकी स्त्री है; अर्थात विरक्ति रुपी स्त्री को लेकर वे उपरोक्त सामानों के साथ राजाओं की तरह सुख से आराम करते हैं।
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