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वैराग्य शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 77
पातालमाविशशि यासि नभो विलङ्घ्य दिङ्मण्डलं भ्रमसि मानस चापलेन । भ्रान्त्यापि जातु विमलं कथमात्मनीतं तद्ब्रह्म न स्मरसि निर्वृतिमेषि येन ।।
हे चित्त! तू अपनी चञ्चलता के कारण पाताल में प्रवेश करता है, आकाश से भी परे जाता है, दशों दिशाओं में घूमता है; पर भूल से भी तू उस विमल परमब्रह्म की याद नहीं करता, जो तेरे ह्रदय में ही मौजूद है, जिसके याद करने से ही तुझे परमानन्द – मोक्ष – मिल सकती है!
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