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वैराग्य शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 76
तस्मादनन्तमजरं परमं विकासि- तद्ब्रह्म चिन्तय किमेभिरसद्विकल्पैः । यस्यानुषङ्गिण इमे भुवनाधिपत्य- भोगादयः कृपणलोकमता भवन्ति।।
उस वास्ते मनुष्यों! अनन्त, अजर, अमर, अविनाशी और शान्तिपूर्ण ब्रह्म का ध्यान करो। मिथ्या जंजालों में क्या रखा है? जो ब्रह्म का ज़रा सा भी आनन्द पा जाते हैं, उनकी नज़रों में संसारी राजाओं का आनन्द तुच्छ जंचता है।
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