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वैराग्य शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 75
भक्तिर्भवे मरणजन्मभयं हृदिस्थं स्नेहो न बन्धुषु न मन्मथजा विकाराः। संसर्गदोषरहिता विजना वनान्ता वैराग्यमस्ति किमितः परमार्थनीयम्।।
सदाशिव की भक्ति हो, दिल में जन्म-मरण का भय हो, कुटुम्बियों में स्नेह न हो, मन से काम-विचार दूर हों और संसर्ग-दोष से रहित होकर जंगल में रहते हों – अगर हममें ये गुण हों तब और कौन सा वैराग्य ईश्वर से मांगें?
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