जीर्णा कंथा ततः किं सितममलपटं पट्टसूत्रं ततः किम्
एका भार्या ततः किं हय करिसुगणैरावृतो वा ततः किम्।।
भक्तं भुक्तं ततः किं कदशनमथ वा वासरांते ततः किं
व्यक्त ज्योतिर्नवांतर्मथितभवभयं वैभवं वा ततः किम्।।
अगर चीथड़ों की बनी हुई गुदड़ी पहनी तो क्या? अगर निर्मल सफ़ेद वस्त्र पहने या पीताम्बर पहने तो क्या? अगर एक ही स्त्री रही तो क्या? अगर अनेक हाथी-घोड़ों सहित अनेकों स्त्रियां रहीं तो क्या? अगर नाना प्रकार के व्यंजन भोजन किये अथवा शाम को मामूली खाना खाया तो क्या? चाहे जितना वैभव पाया, पर यदि संसार बन्धन को मुक्त करनेवाली आत्मज्ञान की ज्योति न जानी, तो कुछ भी न पाया और कुछ भी न किया।
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