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वैराग्य शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 73
प्राप्ताः श्रियः सकलकामदुघास्ततः किं न्यस्तं पदं शिरसि विद्विषतां ततः किं । सम्पादिताः प्रणयिनो विभवैस्ततः किं कल्पस्थितास्तनुभृतां तनवस्ततः किम् ।।
अगर मनुष्यों को सब इच्छाओं के पूर्ण करनेवाली लक्ष्मी मिली तो क्या हुआ? अगर शत्रुओं को पदानत किया तो क्या? अगर धन से मित्रों की खातिर की तो क्या? अगर इसी देह से इस जगत में एक कल्प तक भी रहे तो क्या?
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