हे शिव! मैं कब अकेला, इच्छा रहित और शान्त हूँगा? कब हाथ ही मेरा पात्र होगा और कब दिशाएं मेरे वस्त्र होंगे? मैं कब कर्मों की जड़ उखाड़ने में समर्थ हूँगा?
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