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वैराग्य शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 72
एकाकी निस्पृहः शान्तः पाणिपात्रो दिगम्बरः। कदा शम्भो भविष्यामि कर्मनिर्मूलनक्षमः।।
हे शिव! मैं कब अकेला, इच्छा रहित और शान्त हूँगा? कब हाथ ही मेरा पात्र होगा और कब दिशाएं मेरे वस्त्र होंगे? मैं कब कर्मों की जड़ उखाड़ने में समर्थ हूँगा?
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