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वैराग्य शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 70
गंगातरंगकणशीकरशीतलानि विद्याधराध्युषितचारुशीलतलानि।। स्थानानि किं हिमवतः प्रलयं गतानि यत्सावमानपरपिण्डरता मनुष्याः।।
हिमालय पर्वत के वे चट्टानें जो गंगाजल की लागरों से उठे हुए छींटो से शीतल हो रही है और जहाँ जगह जगह विद्याधर बैठे हैं, क्या अब नहीं रही हैं, जो लोग अपमान से मिले हुए पराये टुकड़ों पर गुज़र करते हैं?
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