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वैराग्य शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 67
इयं बाला मां प्रत्यनवरतमिन्दीवरदल प्रभाचोरं चक्षुः क्षिपति किमभिप्रेतमनया।। गतो मोहोऽस्माकं स्मरकुसुमबाण व्यतिकर- ज्वलज्ज्वाला शान्ति न तदपि वराकी विरमति।।
यह बाला स्त्री मुझ पर बार-बार नीलकमल की शोभा से भी सुन्दर नेत्रों से कटाक्ष क्यों मारती है? मैं नहीं समझता इसका क्या मतलब है? अब तो मेरा मोह जाता रहा है – काम के पुष्प बाणो से निकली हुई आग की ज्वाला शान्त हो गयी है। आश्चर्य है, कि अब तक भी यह मूर्खा बाला अपनी कोशिशों से बाज़ नहीं आती।
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