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वैराग्य शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 66
बाले लीलामुकुलितममीमन्थरा दृष्टिपाताः किं क्षिप्यते विरम विरमं व्यर्थ एव श्रमस्ते।। संप्रत्यन्ये वयमुपरतम् बाल्यामावस्था वनान्ते क्षीणो मोहस्तृणमिव जगज्जालमालोक्यामः।।
ऐ बाला! अब तू लीला से अपनी आधी खुली आँखों से मुझ पर क्यों कटाक्ष बाण चलाती है? अब तू काममद पैदा करने वाली दृष्टी को रोक ले; तेरे इस परिश्रम से तुझे कोई लाभ न होगा। अब हम पहले जैसे नहीं रहे हैं। हमारी जवानी चली गयी है। अब हमने वन में रहने का निश्चय कर लिया है और मोह त्याग दिया है; अब हम विषय सुखों को तृण से भी निकम्मा समझते हैं।
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