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वैराग्य शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 6
खलोल्लापाः सोढाः कथमपि तदाराधनपरै: निगृह्यान्तर्वास्यं हसितमपिशून्येन मनसा । कृतश्चित्तस्तम्भः प्रहसितधियामञ्जलिरपि त्वमाशे मोघाशे किमपरमतो नर्त्तयसि माम् ।।
मैंने दुष्टों की सेवा करते हुए उनकी तानेजानि और ठट्ठेबाज़ी सही, भीतर से, दुख से आये हुए आंसू रोके और उद्विग्न चित्त से उनके सामने हँसता रहा। उन हंसने वालों के सामने, चित्त को स्थिर करके, हाथ भी जोड़े। हे झूठी आशा! क्या अभी और भी नाच नचाएगी?
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