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वैराग्य शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 59
मोहं मार्जयतामुपार्जय रतिं चन्द्रार्धचूडामणौ चेतः स्वर्गतरङ्गिणीतटभुवामासङ्गमङ्गीकुरु । को वा वीचिषु बुद्बुदेषु च तडिल्लेखासु च स्त्रीषु च ज्वालाग्रेषु च पन्नगेषु च सरिद्वेगेषु च प्रत्ययः।।
ऐ चित्त! तू मोह छोड़कर शिर पर अर्धचन्द्र धारण करनेवाले भगवान् शिव से प्रीति कर और गंगा किनारे के वृक्षों के नीचे विश्राम ले। देख! पानी की लहार, पानी के बबूले, बिजली की चमक, आग की लौ, स्त्री, सर्प और नदी के प्रवाह की स्थिरता का कोई विश्वास नहीं; क्योंकि ये सातों चञ्चल हैं।
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