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वैराग्य शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 55
चाण्डाल किमयं द्विजातिरथवा शूद्रोऽथ किं तापसः किं वा तत्त्वविवेकपेशलमतिर्योगीश्वरः कोऽपि किम्। इत्युत्पन्नविकल्पजल्पमुखरैः सम्भाष्यमाणा जनैः न क्रुद्धाः पथि नैव तुष्टमनसो यान्ति स्वयं योगिनः।।
यह चाण्डाल है या ब्राह्मण है? यह शूद्र है या तपस्वी है? क्या यह तत्वविद योगीश्वर है? लोगों द्वारा ऐसी अनेक प्रकार की संशय और तर्कयुक्त बातें सुनकर भी योगी लोग न नाराज़ होते हैं न खुश; वे तो सावधान चित्त से अपनी राह चले जाते हैं।
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