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वैराग्य शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 54
पुण्ये ग्रामे वने वा महति सितपटच्छन्नपालिं कपाली- मादाय न्यायगर्भद्विजहुतहुतभुग्धूमधूम्रोपकण्ठं। द्वारंद्वारं प्रवृत्तो वरमुदरदरीपूरणाय क्षुधार्तो मानी प्राणी स धन्यो न पुनरनुदिनं तुल्यकुल्येषुदीनः।।
वह क्षुधार्त किन्तु मानी पुरुष, जो अपने पेट-रुपी खड्डे के भरने के लिए हाथ में पवित्र साफ़ कपडे से ढका हुआ ठीकरा लेकर वन-वन और गांव-गांव घूमता है और उनके दरवाज़े पर जाता है, जिनकी चौखट न्यायतः विद्वान ब्राह्मणो द्वारा कराये हुए हवन के धुएं से मलिन हो रही है, अच्छा है; किन्तु वह अच्छा नहीं, जो समान कुलवालों के यहाँ जाकर मांगता है।
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