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वैराग्य शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 53
भोगा मेघवितानमध्यविलसत्सौदामिनीचञ्चला आयुर्वायुविघट्टिताभ्रपटलीलीनाम्बुवद्भङ्गुरम्। लोला यौवनलालसा तनुभृतामित्याकलय्य द्रुतं योगे धैर्यसमाधिसिद्धिसुलभे बुद्धिं विधध्वं बुधाः।।
देहधारियों के भोग – विषय सुख – सघन बादलों में चमकनेवाली बिजली की तरह चञ्चल हैं; मनुष्यों की आयु या उम्र हवा से छिन्न भिन्न हुए बादलों के जल के समान क्षणस्थायी या नाशमान है और जवानी की उमंग भी स्थिर नहीं है। इसलिए बुद्धिमानो! धैर्य से चित्त को एकाग्र करके उसे योगसाधन में लगाओ।
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