मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
वैराग्य शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 49
वयमिह परितुष्टा वल्कलैस्त्वं च लक्ष्म्या सम इह परितोषो निर्विशेषावशेषः। स तु भवति दरिद्री यस्य तृष्णा विशाला मनसि च परितुष्टे कोऽर्थवान्को दरिद्रः ।।
हम वृक्षों की छाल पहनकर सन्तुष्ट हैं; आप लक्ष्मी से सन्तुष्ट हो। हमारा तुम्हारा दोनों का सन्तोष समान है, कोई भेद नहीं। वह दरिद्र है, जिसके दिल में तृष्णा है। मन में सन्तोष आने पर कौन धनी और कौन निर्धन है? अर्थात संतोषी के लिए धनी और निर्धन दोनों बराबर हैं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
वैराग्य शतकम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

वैराग्य शतकम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें