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वैराग्य शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 47
विद्या नाधिगता कलंकरहिता वित्तं च नोपार्जितम शुश्रूषापि समाहितेन मनसा पित्रोर्न सम्पादिता। आलोलायतलोचना युवतयः स्वप्नेऽपि नालिंगिताः कालोऽयं परपिण्डलोलुपतया ककैरिव प्रेरितः।।
न तो हमने निष्कलंक विद्या पढ़ी और न धन कमाया; न हमने शांत-चित्त से माता-पिता की सेवा ही की और न स्वप्न में भी दीर्घनायनी कामिनियों को गले से ही लगाया। हमने इस जगत में आकर, कव्वे की तरह पराये टुकड़ों की ओर ताक लगाने के सिवा क्या किया?
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