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वैराग्य शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 43
शिरः शार्व स्वर्गात्पशुपतिशिरस्तः क्षितिधरं महीध्रादुत्तुङ्गादवनिमवनेश्चापि जलधिम्।। अधो गङ्गा सेयं पदमुपगता स्तोकमथवा विवेकभ्रष्टानां भवति विनिपातः शतमुखः।।
देखिये, गङ्गा जी स्वर्ग से शिवजी के मस्तक पर गिरी; उनके सर से हिमालय पर्वत पर; हिमालय से पृथ्वी पर; और पृथ्वी से समुद्र में गिरी। इससे मालूम होता है, कि विवेक-हीनो का पद पद पर सैकड़ो प्रकार से पतन होता है।
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