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वैराग्य शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 41
स्फुरत्स्फारज्योत्स्नाधवलिततले क्वापि पुलिने सुखासीनाः शान्तध्वनिषु द्युसरितः ।। भवाभोगोद्विग्नाः शिवशिवशिवेत्यार्तवचसः कदा स्यामानन्दोद्गमबहुलबाष्पाकुलदृशः।।
वह समय कब आवेगा, जब हम पवित्र गंगा के ऐसे स्थान पर जो चन्द्रमा की चांदनी से चमक रहा होगा , सुख से बैठे होंगे और रात के समय, जब सब तरह का शोरगुल बन्द होगा, आनन्दाश्रुपूर्ण नेत्रों से, संसार के विषय दुखों से थक कर, सर्वशक्तिमान शिव की रटना लगा रहे होंगे?
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