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वैराग्य शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 40
गंगातीरे हिमगिरिशिलाबद्धपद्मासनस्य ब्रह्मध्यानाभ्यसनविधिना योगनिद्रां गतस्य। किं तैर्भाव्यम् मम सुदिवसैर्यत्र ते निर्विशंकाः सम्प्राप्स्यन्ते जरठहरिणाः श्रृगकण्डूविनोदम्।।
अहा! वे सुख के दिन कब आएंगे, जब हम गंगा किनारे, हिमालय की शालिओं पर, पद्मासन लगाकर, विधान-अनुसार आँख मूंदकर, ब्रह्म का ध्यान करते हुए, योग निद्रा में मग्न होंगे और बूढ़े बूढ़े हिरन निर्भय हो, हमारे शरीर की रगड़ से, अपने शरीर की खुजली मिटाते होंगे ?
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