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वैराग्य शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 4
उत्खातं निधिशंकया क्षितितलं ध्माता गिरेर्धातवो निस्तीर्णः सरितां पतिर्नृपतयो यत्नेन संतोषिताः । मन्त्राराधनतत्परेण मनसा नीताः श्मशाने निशाः प्राप्तः काणवराटको‌ऽपि न मया तृष्णेऽधुना मुञ्चमाम् ।।
धन मिलने की उम्मीद से मैंने जमीन के पैंदे तक खोद डाले; अनेक प्रकार की पर्वतीय धातुएं फूंक डाली; मोतियों के लिए समुद्र की भी थाह ले आया; राजाओं को भी राजी रखने में कोई बात उठा न रखी; मन्त्रसिद्धि के लिए रात रात भर श्मसान एकाग्रचित्त से बैठा हुआ जप करता रहा; पर अफ़सोस की बात है, कि इतनी आफ़ते उठाने पर भी एक कानि कौड़ी न मिली। इसलिए हे तृष्णे! अब तो तू मेरा पीछा छोड़।
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