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वैराग्य शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 39
तपस्यन्तः सन्तः किमधिनिवसामः सुरनदीं गुणोदारान्दारानुत परिचयामः सविनयम्। पिबामः शास्त्रौघानुतविविधकाव्यामृतरसा न्न विद्मः किं कुर्मः कतिपयनिमेषायुषि जने।।
हमारी समझ में नहीं आता, कि हम इस अल्प जीवन – इस छोटी सी ज़िन्दगी में क्या क्या करें अर्थात हम गंगा तट पर बस कर तप करें अथवा गुणवती स्त्रियों की प्रेम-सहित यथायोग्य सेवा करें अथवा वेदान्त शास्त्र का अमृत पिएं या काव्यरस-पान करें।
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