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वैराग्य शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 37
वयं येभ्यो जाताश्चिरपरिगता एव खलुते समं यैः संवृद्धाः स्मृतिविषयतां तेऽपि गमिताः। इदानीमेते स्मः प्रतिदिवसमासन्नपतना- ग्दतास्तुल्यावस्थां सिकतिलनदीतीरतरुभिः।।
जिनसे हमने जन्म लिया था, उन्हें इस दुनिया से गए बहुत दिन हो गए; जिनके साथ हम बड़े हुए थे, वे भी इस दुनिया को छोड़कर चले गए। अब हमारी दशा भी रेतीले नदी-किनारे के वृक्षों की सी हो रही है, जो दिन दिन जड़ छोड़ते हुए गिराऊ होते चले जाते हैं।
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