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वैराग्य शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 33
परेषां चेतांसि प्रतिदिवसमाराध्य बहुधा प्रसादं किं नेतुं विशसि हृदयक्लेशकलितम् । प्रसन्ने त्वय्यन्तः स्वयमुदितचिन्तामणि गुणे विमुक्तः संकल्पः किमभिलषितं पुष्यति न ते ।।
हे मलिन मन! तू पराये दिलों को प्रसन्न करने में किसलिए लगा रहता है? यदि तू तृष्णा को छोड़कर संतोष कर ले, अपने में ही संतुष्ट रहे, तो तू स्वयं चिंतामणि स्वरुप हो जाये। फिर तेरी कौन सी इच्छा पूरी न हो?
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