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वैराग्य शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 32
माने म्लायिनि खण्डिते च वसुनि व्यर्थे प्रयातेऽर्थिनि क्षीणे बन्धुजने गते परिजने नष्टे शनैर्यौवने । युक्तं केवलमेतदेव सुधियां यज्जह्नुकन्यापयः- पूतग्रावगिरीन्द्रकन्दरतटीकुञ्जे निवासः क्वचित् ।।
जब लोगों में इज़्ज़त आबरू न रहे; धन नाश हो जाये; याचक लौट लौट कर जाने लगें; भाई-बन्धु, स्त्री-पुत्र और नाते-रिश्तेदार मर जाएं; तब बुद्धिमान को चाहिए कि किसी ऐसे पर्वत की गुहा के कोने में जा बसे, जिसके पत्थर गंगा जी के जल से पवित्र हो रहे हों।
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