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वैराग्य शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 29
अर्थानामीशिषे त्वं वयमपि च गिरामीश्महे यावदित्थं शूरस्त्वं वादिदर्पज्वरशमनविधावक्षयं पाटवं नः। सेवन्ते त्वां धनान्धा मतिमलहतये मामपि श्रोतुकामा मय्यप्यास्था न ते चेत्त्वयि मम सुतरामेष राजन्गतोऽस्मि ।।
यदि तुम धन के स्वामी हो तो हम वाणी के स्वामी हैं। यदि तुम युद्ध करने में वीर हो तो हम अपने प्रतिपक्षियों से शास्त्रार्थ करके उनका मद-ज्वर तोड़ने में कुशल हैं। यदि तुम्हारी सेवा धन-कामी या धनान्ध करते हैं, तो हमारी सेवा अज्ञान-अंधकार का नाश चाहनेवाले, शास्त्र सुनने के लिए करते हैं। यदि तुम्हें हमारी ज़रा भी गरज़ नहीं है, तो हमें भी तुम्हारी बिलकुल गरज़ नहीं है। लो, हम भी चलते हैं।
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