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वैराग्य शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 24
त्वं राजा वयमप्युपासितगुरुप्रज्ञाभिमानोन्नताः ख्यातस्त्वं विभवैर्यशांसि कवयो दिक्षु प्रतन्वन्ति नः । इत्थं मानद नातिदूरमुभयोरप्यावयोरन्तरं यद्यस्मासु पराङ्मुखोऽसिवयमप्येकान्ततो निःस्पृहाः।।
अगर तू राजा है, तो हम भी गुरु की सेवा से सीखी हुई विद्या के अभिमान से बड़े हैं। अगर तू अपने धन और वैभव के लिए प्रसिद्ध है, तो कवियों ने हमारी विद्या की कीर्ति भी चारों और फैला रखी हैं। हे मानभञ्जन करने वाले, तुझमें और हममें ज्यादा फर्क नहीं है। अगर तू हमारी ओर नहीं देखता, तो हमें भी तेरी परवा नहीं है।
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