वैराग्य शतकम्
आजानन्माहात्म्यं पततु शलभो दीपदहने
स मीनोऽप्यज्ञानाद्वडिशयुतमश्नातु पिशितम् ।
विजानन्तोऽप्येतान्वयमिह विपज्जालजटिलान्
न मुञ्चामः कामानहह गहनो मोहमहिमा ॥
अज्ञानवश, पतङ्ग दीप की लौ पर गिरकर अपने तई भस्म कर लेता है; क्योंकि वह उसके परिणाम को नहीं जानता; इसी तरह मछली भी कांटे के मांस पर मुंह चलकर अपने प्राण खोती है, क्योंकि वह उससे अपने प्राण-नाश की बात नहीं जानती। परन्तु हम लोग तो अच्छी तरह जानबूझकर भी विपद मूलक विषयों की अभिलाषा नहीं त्यागते। मोह की महिमा कैसी विस्मयकर है।
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