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वैराग्य शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 20
स्तनौ मांसग्रन्थि कनकलशावित्युपमितौ मुखं श्लेष्मागारं तदपि च शशाङ्केन तुलितम ।। स्रबन्मूत्रक्लिन्नम् करिवरकरस्पर्द्धि जघन- महो निन्द्यम रूपं कविजन विशेषैर्गुरु कृतं ।।
स्त्रियों के स्तन, मांस के लौंदे हैं, पर कवियों ने उन्हें सोने के कलशों की उपमा दी है। स्त्रियों का मुंह कफ का घर है, पर कवी उसे चन्द्रमा के समान बताते हैं और उनकी जांघो को, जिनमे पेशाब प्रभृति बहते रहते हैं, श्रेष्ठ हाथी की सूंड के समान कहते हैं। स्त्रियों का रूप घृणा योग्य है, पर कवियों ने उसकी कैसी तारीफ की है।
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