भिक्षासनं तदपि नीरसमेकवारं
शय्या च भूः परिजनो निजदेहमात्रं।
वस्त्रं च जीर्णशतखण्डसलीनकन्था
हा हा तथाऽपि विषया न परित्यजन्ति।।
वह मनुष्य जो भीख मांगकर दिन में एक समय ही नीरस अलौना अन्न खाता है, धरती पर सो रहता है, जिसका शरीर ही उसका कुटुम्बी है जो सौ थेगलियों (चीथड़ों) की गुदड़ी ओढ़ता है, आश्चर्य है कि, ऐसे मनुष्य को विषय नहीं छोड़ते!
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