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वैराग्य शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 17
विवेकव्याकोशे विदधति शमे शाम्यति तृषा- परिष्वङ्गे तुङ्गे प्रसरतितरां सा परिणतिः। जराजीर्णैश्वर्यग्रसनगहनाक्षेपकृपणस्तृषापात्रं यस्यां भवति मरुतामप्यधिपतिः ।।
जब ज्ञान का उदय होता है, तब शान्ति की प्राप्ति होती है। शान्ति की प्राप्ति से तृष्णा शान्त होती जाती है, किन्तु वही तृष्णा विषयों के संसर्ग से बेहद बढ़ जाती है। मतलब यह है, कि विषयों से तृष्णा कभी शान्त नहीं हो सकती। सुन्दरी के कठोर कूचों पर हाथ लगाने से काम-मद बढ़ता है, घटता नहीं। जराजीर्ण ऐश्वर्य को देवराज इन्द्र भी नहीं त्याग सकते।
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