क्षान्तम् न क्षमया ग्रहोचितसुखं त्यक्तं न सन्तोषतः
सोढा दुःसहशीतवाततपनक्लेशा न तप्तम् तपः।
ध्यातं वित्तमहर्निशं नियमितप्राणैर्न शम्भोः पदम्
तत्तत्कर्म कृतम्य यदेव मुनिभिस्तैस्तैः फलैर्वचितम् ।।
क्षमा तो हमने की, परन्तु धर्म के ख्याल से नहीं की। हमने घर के सुख चैन तो छोड़े पर सन्तोष से नहीं छोड़े। हमने सर्दी-गर्मी और हवा के न सह सकने योग्य दुख तो सहे; किन्तु ये सब दुख हमने तप की गरज से नहीं, किन्तु दरिद्रता के कारण सहे। हम दिन रात ध्यान में लगे तो रहे, पर धन के ध्यान में लगे रहे – हमने प्राणायाम क्रिया द्वारा शम्भू के चरणों का ध्यान नहीं किया । हमने काम तो सब मुनियों जैसे किये, परन्तु उनकी तरह फल हमें नहीं मिले।
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