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वैराग्य शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 100
आघ्रातं मरणेन जन्म जरया विद्युच्चलं यौवनं सन्तोषो धनलिप्सया शमसुखं प्रौढाङ्गनाविभ्रमैः । लोकैर्मत्सरिभिर्गुणा वनभुवो व्यालैर्नृपा दुर्जनैः अस्थैर्येण विभूतिरप्यपहृता ग्रस्तं न किं केन वा ।। ।। इति वैराग्य शतकम् ।। भर्तृहरिविरचितम् (शतकत्रय)समाप्त ।।
मृत्यु ने जन्म को ग्रस रक्खा है, बुढ़ापे ने बिजली के समान चञ्चल युवावस्था को ग्रस रक्खा है, धन की इच्छा ने सन्तोष को ग्रस रक्खा है, जलनेवालों ने गुणों को ग्रस रक्खा है, सर्प और जंगली जानवरों ने वन को ग्रस रक्खा है, दुष्टों ने राजाओं को ग्रस रक्खा है, अस्थिरता या चञ्चलता ने धनैश्वर्य को ग्रस रक्खा है; तब ऐसी कौन सी चीज़ है, जो किसी दूसरी नाशक चीज़ के चंगुल में नहीं है?
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