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वैराग्य शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 10
हिंसाशून्यमयत्नलभ्यमशनं धात्रामरुत्कल्पितं व्यालानां पशवः तृणांकुरभुजः सृष्टाः स्थलीशायिनः । संसारार्णवलंघनक्षमधियां वृत्तिः कृता सा नृणां यामन्वेषयतां प्रयांति संततं सर्वे समाप्ति गुणाः ।।
विधाता ने हिंसारहित, बिना उद्योग के मिलने वाली हवा का भोजन साँपों की जीविका बनाई, पशुओं को घास खाना और जमीन पर सोना बताया; किन्तु जो मनुष्य अपनी बुद्धि के बल से भवसागर के पार हो सकते हैं, उनकी जीविका ऐसी बनाई कि जिसकी खोज में उनके सारे गुणों की समाप्ति हो जाये, पर वह न मिले।
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