यह बिराग संदीपनी सुजन सुचित सुनि लेहु ।
अनुचित बचन बिचारि के जस सुधारि तस देहु ॥
॥ इति श्रीमद्गोस्वामीतुलसीदासकृत वैराग्यसंदीपनी संपूर्णम् ॥
सज्जनो! इस बैराग्य-संदीपनी को सावधान एवं स्थिर चित्त से सुनो और विचारकर अनुचित वचनों को जहाँ जैसा उचित हों सुधार दो।
॥ श्रीमद्गोस्वामीतुलसीदास कृत ‘वैराग्य-संदीपनी ‘ समाप्त ॥
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