तुलसी यह तनु तवा है तपत सदा त्रैताप ।
सांति होई जब सांतिपद पावै राम प्रताप ॥
तुलसीदासजी कहते हैं कि यह शरीर तवा है, जो सदा (आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक) तीनों तापों से जलता रहता है। इस जलन से तभी शान्ति होती है, जब भगवान् श्रीरामजी के प्रताप से शान्तिपद (परम शान्तिस्वरूप भगवान् के परमपद) की प्राप्ति हो जाती है।
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