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वैराग्य संदीपनी • अध्याय 1 • श्लोक 58
दोहा – सोइ पंडित सोइ पारखी सोई संत सुजान । सोई सूर सचेत सो सोई सुभट प्रमान ॥ ५८॥ सोइ ग्यानी सोइ गुनी जन सोई दाता ध्यानि । तुलसी जाके चित भई राग द्वेष की हानि ॥
तुलसीदास जी कहते हैं कि जिसके चित्त से राग-द्वेष का नाश हों गया है, वही पण्डित है, वही (सत-असत का) पारखी है; वही चतुर संत है, वही शूरवीर है, वही सावधान है; वही प्रामाणिक योद्धा है, वही ज्ञानी है, वही गुणवान्‌ पुरुष है, वही दाता है और वही ध्यान-सम्पन्न है।
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