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वैराग्य संदीपनी • अध्याय 1 • श्लोक 57
चौपाई – जरै बरै अरु खीझि खिझावै । राग द्वेष महँ जनम गँवावै ॥ सपनेहुँ सांति नहि उन देही । तुलसी जहाँ-जहाँ ब्रत एही ॥
जो सदा (अहंकार तथा कामना की अग्रि में) जलते-बरते रहते हैं, स्वयं क्रोध करके दूसरों को क्रोधित करते हैं और राग-द्वेष में ही अपना जन्म (जीवन) खो देते हैं – तुलसीदासजी कहते हैं कि जहाँ-जहाँ ऐसा व्रत है (अर्थात्‌ जिन-जिनका ऐसा स्वभाव है) उनके शरीर में (जीवन में) स्वप्न में भी शान्ति नहीं होती।
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