चौपाई –
जरै बरै अरु खीझि खिझावै ।
राग द्वेष महँ जनम गँवावै ॥
सपनेहुँ सांति नहि उन देही ।
तुलसी जहाँ-जहाँ ब्रत एही ॥
जो सदा (अहंकार तथा कामना की अग्रि में) जलते-बरते रहते हैं, स्वयं क्रोध करके दूसरों को क्रोधित करते हैं और राग-द्वेष में ही अपना जन्म (जीवन) खो देते हैं – तुलसीदासजी कहते हैं कि जहाँ-जहाँ ऐसा व्रत है (अर्थात् जिन-जिनका ऐसा स्वभाव है) उनके शरीर में (जीवन में) स्वप्न में भी शान्ति नहीं होती।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
वैराग्य संदीपनी के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
वैराग्य संदीपनी के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।