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वैराग्य संदीपनी • अध्याय 1 • श्लोक 56
जद्यपी सीतल सम सुखद जगमें जीवन प्रान । तदपि सांति जल जनि गनौ पावक तेल प्रमान ॥
यद्यपि वह शान्तिपद शीतल है, सम है तथा सुखदायक है और जगत में (संतों का) जीवन-प्राण है तथापि उसे (साधारण) जल (के समान) मत समझो, (जल के समान शीतल होने पर भी) उसका तेज अग्नि के समान है।
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