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वैराग्य संदीपनी • अध्याय 1 • श्लोक 55
तेज होत तन तरनि को अचरज मानत लोइ । तुलसी जो पानी भया बहुरि न पावक होइ ॥
तुलसीदासजी कहते हैं कि (उस अहङ्कार रहित संत के) शरीर का तेज सूर्य का-सा हो जाता है, लोग (उसे देख-देखकर) आश्चर्य मानते हैं; परंतु (शान्ति के द्वारा) जो जल (के समान शीतल) हों गया है, वह फिर अग्नि (के समान) नहीं हो सकता (उसमें अहङ्कार का उदय नहीं होता)।
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