तुलसी सुखद सांति को सागर ।
संतन गायो करन उजागर ॥
तामें तन मन रहै समोई ।
अहं अगिनि नहिं दाहैं कोई ॥
तुलसीदासजी कहते हैं कि जिसे संतों ने सुखदायक, शान्ति का समुद्र और (ज्ञान का) प्रकाश करने वाला बतलाया है, उसमें यदि कोई तन-मन से समा जाय-लीन होकर रहे तो उसे अहंकार की अग्नि किसी प्रकार नहीं जला सकती।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
वैराग्य संदीपनी के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
वैराग्य संदीपनी के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।