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वैराग्य संदीपनी • अध्याय 1 • श्लोक 50
दोहा – सात दीप नव खंड लौ तीनि लोक जग माहिं । तुलसी सांति समान सुख अपर दूसरो नाहीं ॥
तुलसीदासजी कहते हैं कि सातों द्वीप, नवों खण्ड (नहीं-नहीं) तीनों लोक और जगत् ‌भर में शान्ति के समान दूसरा कोई सुख नहीं है।
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