जो अत्यन्त शीतल, अत्यन्त ही निर्मल (पवित्र) तथा समस्त कामनाओं से रहित होता है और जिसकी वृत्ति शान्ति में लवलीन रहती है, तुलसीदासजी कहते हैं कि उसी को अतीत (गुणातीत) समझना चाहिये।
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